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Wednesday, April 29, 2015

मलबे से जीवन ढूंढने में लगे हैं इनसान के 'सबसे वफ़ादार दोस्त'

भूकंप से बुरी तरह प्रभावित नेपाल में बचाव के काम में इनसान के सबसे 'वफ़ादार माने जाने वाले दोस्त' भी पूरी शिद्दत के साथ जुटे हुए हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं उन प्रशिक्षित कुत्तों की जिन्हें भारत, फ्रांस और स्पेन से विशेष तौर पर बचाव कार्य में लगाया गया है। इन कुत्तों को मलबे के नीचे दबे हुए जीवित लोगों को ढूंढ निकालने में महारत हासिल है।



भारत से एनडीआरएफ की टीमों के साथ खास तौर पर इस तरह के प्रशिक्षित कुत्तों को भी नेपाल लाया गया है।

फ्रांस और स्पेन से 15 लोगों की टीम छह प्रशिक्षित कुत्तों के साथ बचाव कार्य के लिए नेपाल पहुंची है।

गोल्डन रिट्राइवर और जर्मन शेपर्ड नस्ल के इन कुत्तों को मलबे के पास ले जाया जाता है तो इनकी सक्रियता तब देखते बनती है जब इन्हें किसी जीवित व्यक्ति के फंसे होने का आभास होता है।

इन कुत्तों को विमान पर लंबी हवाई यात्रा के दौरान लाते समय विशेष ध्यान बरता जाता है। इन्हें खास तौर पर बनाए गए सुविधाजनक केबिन्स में लाया जाता है जिससे लंबी हवाई यात्रा का इन पर असर ना पड़े।

पशुपतिनाथ को किसने बचाया? क्लिक कर शेयर करें अपनी राय

एक ओर भूकंप के झटकों ने लगभग आधे नेपाल को तबाह कर दिया। हजारों लोगों की मौत हो गई और सैंकड़ों की संख्या में लोग घायल हुये हैं। लेकिन भगवान भोले के पशुपतिनाथ मंदिर पर आंच तक नहीं आई। ठीक उसी तरह जैसे साल 2013 में आई बाढ़ केदरनाथ मंदिर का बाल भी बाका नहीं कर पाई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि...

Monday, April 27, 2015

बिनासकारी भुकम्प ने नेपाल और भारतमे हजारौ लोगौकी मौत

देश के कम से कम 38 शहर बेहद जोखिम वाले भूकंप क्षेत्र में स्थित हैं और देश का 60 फीसदी भौगोलिक हिस्सा भूकंप की चपेट में आ सकता है.
दिल्ली मेट्रो जैसे कुछ प्रोजेक्ट को छोड़ दिया जाए, तो शहरों की अधिकांश संरचना तेज भूकंप को झेलने में सक्षम नहीं है और ऐसे में इन शहरों में भूकंप आने पर बड़ी तबाही हो सकती है.




नेपाल में आए भूकंप का अंदाजा भूवैज्ञानिकों को पहले से ही था, जिन्होंने एशिया की में भारतीय उपमहाद्वीप के लगातार पड़ रहे दबाव के चलते हिमालयी क्षेत्र में और भी भूकंप आने की चेतावनी दी है.

भूकंप रोधी मकान के लिए बाध्यकारी निर्देश नहीं
भारतीय मानक ब्यूरो ने 1962 में पहली बार 'भूकंप रोधी डिजाइन के लिए भारतीय मानक शर्त' का प्रकाशन किया था, जिसमें ताजा संशोधन 2005 में किया गया है. इसकी सिफारिश के मुताबिक देश के कम ही मकान बने हुए हैं. ये मानक बाध्यकारी नहीं है. इसलिए किसी को पता नहीं है कि भूकंप-रोधी आवासीय मकान बनाने के लिए कोई दिशा-निर्देश है.

दिल्ली मेट्रो का स्ट्रक्चर भूकंप झेलने में सक्षम है और ऐसी कुछ ही संरचनाएं हैं. भुज में 2001 का भूकंप आने के बाद बने मकान इस मानक पर आधारित हैं.



महाराष्ट्र के लातूर में 1993 में आए 6.4 तीव्रता के भूकंप में करीब 10 हजार लोग मारे गए थे, जबकि इस क्षेत्र को भूकंप वाला क्षेत्र नहीं माना जाता है. इस भूकंप में ज्यादातर लोग इसलिए मारे गए, क्योंकि मकानों की संरचना भूकंप झेलने के लायक नहीं थी. इसी वजह से गुजरात में भी लोग मारे गए थे.

38 शहरों के मकान भूकंप झेलने लायक नहीं
भारत सरकार ने अभी भूकंप क्षेत्र में पड़ने वाले 38 प्रमुख शहरों की सूची बनाई है. गृह मंत्रालय के लिए 2006 में संयुक्त राष्ट्र की ओर से तैयार की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है, 'इन शहरों के अधिकतर मकान भूकंप झेलने में सक्षम नहीं हैं. इसलिए इनमें से किसी भी शहर में भूकंप आने पर बड़ी तबाही हो सकती है.'

भूवैज्ञानिकों के मुताबिक, भूखंड एक विशाल पट्टी पर तैरता है. ये पट्टियां लगातार खिसकती रहती हैं, जिससे भूकंप आते हैं. छोटे झटके हम महसूस नहीं कर पाते, लेकिन बड़े झटके हमें हिला देते हैं. हिमालय और उत्तर भारत खास तौर से भूकंप वाले क्षेत्र में पड़ता है. इंसान का अस्तित्व पैदा होने से बहुत पहले एक विशाल महाद्वीप गोंडवाना से टूटकर भारत अलग हुआ था.

भारतीय पट्टी उत्तर की ओर खिसकती हुई करीब 2000 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए यूरेशियन पट्टी से टकरा गई. इसी टकराव से हिमालय बना.

60 फीसदी हिस्से में आ सकता है भूकंप
भारत अब भी एशिया की मुख्य भूमि पर सालाना 5 सेंटीमीटर की दर से दबाव डाल रहा है. हाल में सबसे बड़ा भूकंप 2005 में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आया था, जो भारत और यूरेशियाई पट्टी के टकराव के शीर्ष पर स्थित है. इस भूकंप में करीब 80 हजार लोग मारे गए थे.

भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर की ओर पड़ने वाले दबाव के कारण देश का 60 फीसदी हिस्सा भूकंप की चपेट में आ सकता है. गुजरात में 2001 में आए भूकंप में करीब 20 हजार लोग मारे गए थे. इसके बाद 2004 में सुनामी इसलिए पैदा हुई थी, क्योंकि भारतीय पट्टी और बर्मा पट्टी का जोड़दार घर्षण हुआ था. बर्मा पट्टी पर ही अंडमान निकोबार द्वीप स्थित है. इस घर्षण के कारण 9.3 तीव्रता का भूकंप आया था, जो तीसरा सबसे भयानक भूकंप था.

इसके कारण धरती की सतह 100 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में टूट कर ऊपर उठ गई. इससे एक विशाल जल राशि में उछाल आया, जिससे पैदा हुई सुनामी में 14 देशों में करीब 2,30,000 लोग मारे गए.

दिल्ली जोन-4 में, मुंबई-कोलकाता जोन-3 में
अभी तक देश के प्रमुख शहर में बड़ा भूकंप नहीं आया है, लेकिन दिल्ली भूकंप जोन-4 में स्थित है. श्रीनगर और गुवाहाटी भूकंप क्षेत्र-5 में स्थित है. मुंबई, कोलकाता और चेन्नई भूकंप जोन-3 में स्थित है. ऐतिहासिक संकेतों के मुताबिक एक भयानक भूकंप कभी भी आ सकता है. यह सबक बिहार में 1934 और असम में 1950 में आए भूकंप से मिलता है.

बिहार के 1934 के 8.4 तीव्रता के भूकंप का केंद्र हिमालय से 10 किलोमीटर दक्षिण में था. इसका झटका मुंबई और ल्हासा तक महसूस किया गया था. इसमें बिहार के अधिकतर जिले के करीब सभी बड़े मकान धाराशायी हो गए थे. कोलकाता में भी कई मकान ध्वस्त हो गए थे. इस आपदा में 8,100 लोग मारे गए थे. इस पर महात्मा गांधी ने कहा था कि यह छुआछूत के पाप की सजा है.

भूवैज्ञानिकों के मुताबिक, 1950 के असम के भूकंप ने हिमालय में एक बड़े भूकंप की जमीन तैयार कर दी है. इस भूकंप के बाद 65 साल बीत गए हैं और संभव है कि कोई विकराल भूकंप आने ही वाला हो.

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